Saturday, July 13, 2013

चाँद-तारे निगल गया सूरज........अन्सार कम्बरी


चाँद-तारे निगल गया सूरज
आग ऐसी उगल गया सूरज

सर पे चड़ने का नतीजा देखा
किस तरह मुँह के बल गया सूरज

इसलिये मैं दिये जलाता हूँ
मेरे घर से निकल गया सूरज

शाम होते मुझे ये लगता है
आस्माँ से फिसल गया सूरज

उसको दिनभर नहीं मिला कुछ भी
अपने हाथों को मल गया सूरज

चाँद-तारों को रौशनी देकर
शाम चुपके से ढल गया सूरज

‘क़म्बरी’ ये बता नहीं पाया
जाने किस शै से जल गया सूरज

-अन्सार कम्बरा

13 comments:

  1. बहुत खुबसूरत भावो की अभिवय्क्ति…।

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  3. बेहतरीन रचना और सुंदर अभिव्यक्ति .......!!

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  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14 -07-2013) के चर्चा मंच -1306 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  5. बेहतरीन रचना

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  6. अद्भुत भाव भरती कविता....

    चाँद-तारों को रौशनी देकर
    शाम चुपके से ढल गया सूरज

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  7. wahh bahut hi khubsurat avivyakti .. ekdam naye andaaz me .. badhayi :)

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  8. ‘क़म्बरी’ ये बता नहीं पाया
    जाने किस शै से जल गया सूरज

    क्या बात है, बेहतरीन प्रस्तुति ।

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  9. बहुत बहुत सुंदर

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