आंधी तक है तेज हवा की, बाढ़ों तक पानी की हद
पर राजाओं ने कब तय की, अपनी मनमानी की हद
मेहमानों का आदर करना,अच्छा है लेकिन यारों
मेहमां घर को ही ले बैठे. ये है मेहमानी की हद
याचक जो भी चाहे, उसके क्या वो ही दे देंगे हम
दानी से कहियेगा, कुछ तो होती है दानी की हद
सैलानी बनकर आए हो, क्या तुमको मालूम नहीं
औरों के घर में होती है, कुछ तो सैलानी की हद
ये तो है अन्याय, कि महलों को तो पूरी छूट मिले
और इधर तय कर दी जाए, हर छप्पर-छानी की हद
उत्तर में वो यह कह देंगे, अपनी सीमा कोई नहीं
परधानों से पूछ के देखो, उनकी परधानी की हद
उसके आगे खुशियां भी होंगी, मुझके मालूम नहीं
बस यह जाना, चिंता तक है, मेरी पेशानी की हद
हम तो अन्न उगाकर भी भूखे हैं, अब तुम बतलाओ
कुछ तो होगी, यार तुम्हारी भी तो हैरानी की हद
उसके बाद तो, कड़वाहट ही कड़वाहट है जीवन में
शायद बचपन तक ही है, ये मीठी गुड़धानी की हद
उसके राज में, जनता तो भूखी-प्यासी मरनी ही है
रानी तक गर है राजा की, राजा तक रानी की हद
डॉ. कुंवर बेचैन
जन्मः 01 जुलाई 1942, मुरादाबाद उ.प्र.
सौजन्यः रसरंग, दैनिक भास्कर