Thursday, May 9, 2013


अभी-अभी जो चली हवा,
एक सर्द सा एहसास हुआ,..

दिल को करार सा मिला,
दर्द जाने कंहा गुम हुआ,..

गालों पे लुढ़क आई बूंदे,
आंखो को जाने क्या हुआ,..

मेरे लब जरा सा हंस दिए,
बेचैनियों को विदा किया,..

सब सोचने लगे मुझे देखकर,
अचानक मुझे ये क्या हुआ,..

नम थी मेरी आंखे भले ही,
पर खुशी का अहसास हुआ,..

कोई आकर न मुझसे मिला,
न बात,न ही कोई वादा हुआ,..

पर ये हवांए यूंही नही चली,
बेसबब तो कुछ भी न हुआ,..

जिसके लिए तरसी ये आंखे,
मैं जानती हूं "वो" आ गया,
---प्रीति सुराना

5 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आपका आभार.

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-05-2013) के "मेरी विवशता" (चर्चा मंच-1240) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुन्दर

    ReplyDelete
  4. पर ये हवांए यूंही नही चली,
    बेसबब तो कुछ भी न हुआ,..

    ...बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete