Thursday, May 2, 2013

सर चढ़ के बोलता था .. ‘ईमानदारी का नशा’............अमित हर्ष


दिल से निकल गया, .. नज़र से उतर गया
अच्छा हुआ ये भूत ....... सर से उतर गया

घबराहट होगी .. सताएगा अकेलापन बहुत
बुलंदी से मैं फ़क़त इस .. डर से उतर गया

दस्तार रही सलामत .. इज्ज़त भी बच गई
पर इस कोशिश में सर .. धड़ से उतर गया

सर चढ़ के बोलता था .. ‘ईमानदारी का नशा’
अब तो वो खुमार भी ........ अरसे उतर गया

यूं तो यकीं करने को .. यहाँ हमसफ़र बहुत है
पर क्या करें एतबार .. रहगुज़र से उतर गया

--अमित हर्ष

5 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (03-05-2013) के "चमकती थी ये आँखें" (चर्चा मंच-1233) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. यूं तो यकीं करने को .. यहाँ हमसफ़र बहुत है
    पर क्या करें एतबार .. रहगुज़र से उतर गया

    बहूत खूब

    हो सके तो इस छोटी सी पंछी की उड़ान को आशीष दीजियेगा

    नई पोस्ट
    तेरे मेरे प्यार का अपना आशियाना !!

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  3. यूं तो यकीं करने को .. यहाँ हमसफ़र बहुत है
    पर क्या करें एतबार .. रहगुज़र से उतर गया
    सच्चाई .......

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  4. waaaaaaaaaah waaaaaaaaaaah
    bhetrin hai waaaah

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  5. imaandaari ka nasha utar gaya... bahut khub....

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