Wednesday, May 29, 2013

तपती गरमी जेठ मास में....................ज्योति खरे


अनजाने ही मिले अचानक
एक दोपहरी जेठ मास में
खड़े रहे हम बरगद नीचे
तपती गरमी जेठ मास में-----
               
               
प्यास प्यार की लगी हुई
होंठ मांगते पीना
सरकी चुनरी ने पोंछा
बहता हुआ पसीना
रूप सांवला हवा छू रही
बेला महकी जेठ मास में-----

बोली अनबोली आंखें
पता मांगती घर का
लिखा धूप में उंगली से
ह्रदय देर तक धड़का
कोलतार की सड़क ढूँढ़ती
भटकी पिघली जेठ मास में-----

स्मृतियों के उजले वादे
सुबह-सुबह ही आते
भरे जलाशय शाम तलक
मन के सूखे जाते
आशाओं के बाग़ खिले जब
बूंद टपकती जेठ मास में------

"ज्योति खरे"  
http://jyoti-khare.blogspot.in/2013/05/blog-post_27.html

8 comments:

  1. आदरणीया,प्रणाम
    बहुत बहुत आभार आपका, मुझे "मेरी धरोहर" में सम्मलित
    करने का
    सादर

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज बृहस्पतिवार(30-05-2013) हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं ( चर्चा - 1260 ) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. लाजवाब प्रस्तुति और अभिव्यक्ति |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति,आशाओं के बाग़ खिले जब
    बूंद टपकती जेठ मास में-----

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  5. आशाओं के बाग़ खिले जब
    बूंद टपकती जेठ मास में------

    मदमस्त करती पोस्ट... बढ़िया

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  6. सुन्दर प्रस्तुति

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