Monday, May 20, 2013

मेरा साया भी मुइसे खफा खफा सा लगता है.........मनीष गुप्ता



ज़िंदगी फ़कीराना सी होने लगी है शायद
आता जाता हर शख्स खुदा सा लगता है

दुआओं का असर कुछ यूँ हो रहा है मुझ पर
जिस्म और रूह में अब फासला सा लगता है

एहसास के कतरे भीगी पलकों पे ठहरे हैं
ख्याबों का कोई थका कारवाँ सा लगता है

न कीजिये अब मुझसे मुहब्बत की बातें आप
इंतजारे-इश्क़ में हर लम्हा सजा सा लगता है

धड़कनें कहती हैं दिल से जब जुदाई की दास्ताँ
तुम्हारे बिना ये जीना एक गुनाह सा लगता है

बुनता रहता है धूप में अक्सर यादों के सपने
मेरा साया भी मुइसे खफा खफा सा लगता है

---मनीष गुप्ता

11 comments:

  1. बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल की प्रस्तुति,आभार.

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  2. आपकी यह रचना कल मंगलवार (21 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण अंक - २ पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  3. धड़कनें कहती हैं दिल से जब जुदाई की दास्ताँ
    तुम्हारे बिना ये जीना एक गुनाह सा लगता है..bahut khoob ....

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  4. बहुत सुन्दर ग़ज़ल.... बेहतरीन प्रस्तुति,आभार.

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  5. सुंदर प्रस्तुति!

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  6. ज़िंदगी फ़कीराना सी होने लगी है शायद
    आता जाता हर शख्स खुदा सा लगता है

    दुआओं का असर कुछ यूँ हो रहा है मुझ पर
    जिस्म और रूह में अब फासला सा लगता है
    बहुत बढ़िया ...
    ख्याबों का कोई थका कारवाँ सा लगता है
    इस पंक्ति में क्या आप ख्यालों कहना चाहते हैं या ख़्वाबों कहना चाहते हैं कुछ त्रुटि लगती है ...कृपया चेक कर लें ...

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