अब तो एक आदत - सी हो गई है , अपने आप से कहने की , "थकना मना है" ...... बेशुमार आँसुओं को पीकर मुस्कुरा कर कहने की , "रोना मना है" ........ औरत हूँ , औरों के लिए ही जीना है , आइने में भी अपना वजूद "ढूँढना मना है" ............ - चंचलिका शर्मा
waah bahut sundar kavita, aise bhav urja se paripurn hote hain jo sakaratmak urja pravahit karten hai. naari ke bhavon ko satik ukera hai aapne..... subdar
बहुत सुन्दर!!
ReplyDeleteपर अपने पर भी ध्यान ना देना,.....मना है !
ReplyDeleteसुन्दर।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर ,आभार। "एकलव्य"
ReplyDeleteवाह ! बहुत ही सुन्दर! गागर में सागर।
ReplyDeleteलाजवाब औरत के जज्बातों को बखूबी उकेरा है
ReplyDeletewaah bahut sundar kavita, aise bhav urja se paripurn hote hain jo sakaratmak urja pravahit karten hai. naari ke bhavon ko satik ukera hai aapne..... subdar
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