Saturday, March 11, 2017

सामंजस्य.....मल्लिका मुखर्जी





कितना सामंजस्य है
सपनों और वृक्षों में !
दोनों
पंक्तियों में सजना पसंद करते हैं ।
कितना भी काटो-छाँटों
उनकी टहनियाँ,
तोड़ लो सारे फल चाहे
नोंच लो सारी पत्तियाँ,
मसल दो फूल और कलियाँ;
फिर भी पनपते रहते हैं
असीम जिजीविषा के साथ
जब तक उन्हें
जड़ से न उखाड़ दिया जाए ।

बचा हो जहन में बीज तो
अवसर मिलते ही
फिर बेताब हो उठते हैं
अपनी-अपनी जमीं पर
अंकुरित होने के लिए !
















-मल्लिका मुखर्जी

3 comments:

  1. बचा हो जहन में बीज तो
    अवसर मिलते ही
    फिर बेताब हो उठते हैं
    अपनी-अपनी जमीं पर
    अंकुरित होने के लिए !......वाह!

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  2. बहुत सुन्दर

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