Saturday, September 1, 2012

परछाई..............किरण मानसी :: प्रस्तुतिकरण :: सोनू अग्रवाल

याद करते हैं हम, तुम्हें तन्हाई में

दिल डूबा है गमों की गहराई में


हमें मत ढूँढना दुनिया की भीड़ में


हम मिलेंगे तुम्हें तुम्हारी हीं परछाई में


क्योंकि खुशबू कब फूल से जुदा रहती है ?

चाँदनी कब चाँद से जुदा रहती है ?


रोशनी कब सूरज से जुदा रहती है ?


कब धडकनें दिल से जुदा रहती है ?


या तो ये हमेशा साथ होते हैं या नहीं होते हैं


वैसे हीं मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी


कभी तुम्हारी परछाईं बन कर


कभी खुशबू बनकर


कभी चाँदनी बनकर


कभी धड़कन बनकर


तुम मुझे पा जाओगे


आईने में, हवाओं में


धूप में, छाँव में


लेकिन मुझे मत ढूँढना, लोगों की भीड़ में


क्योंकि मैं तुम्हें मिलूंगी, तुम्हारी हीं परछाई में


मैं जानती हूँ, आजकल तुम मुझे तलाश रहे हो


महफिलों में, लोगों के चेहरों में


मैं भी तुमसे मिलना चाहती हूँ


लेकिन इस दुनिया की भीड़ से दूर


दो दिलों की तनहाई में


- किरण मानसी 
 
प्रस्तुतिकरण :: सोनू अग्रवाल 

13 comments:

  1. तुम मुझे पा जाओगे
    आईने में, हवाओं में
    धूप में, छाँव में
    ........
    दिल का साया हमसाया
    मै तुम में ही मिलूंगा
    तुम भी मिलना
    दिल की तनहाई में.........

    -

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  2. धन्यवाद राहुल
    आपकी कोई नई रचना नहीं आई

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    1. 27 august ko ek post likha tha.... alokit shabd....

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    2. mail Link
      Yashodadigvijay4@gmail.com

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  3. यशोदा जी आपने मेरे ब्लॉग पर जो प्रश्न किया था, उस विषय में मेरे ब्लॉग पर 2 पोस्टें पहले से ही हैं:

    पोस्ट चोरी रोकने के लिए ये लेख पढ़ें:

    1. पोस्ट कॉपी (चोरी) करने वालों से बचने का उपाय
    2. आज ही अपनाइए 'ब्लॉग पोस्ट सुरक्षा कवच'

    इनमें से किसी एक या दोनों का इस्तेमाल कर सकती हैं

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  4. पिछली टिप्पणी में गलत सूचना के लिये खेद है ---

    दिनांक 16 /12/2012 (रविवार)को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. भावो का सुन्दर समायोजन......

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  6. लेकिन मुझे मत ढूँढना, लोगों की भीड़ में

    क्योंकि मैं तुम्हें मिलूंगी, तुम्हारी हीं परछाई में

    मैं जानती हूँ, आजकल तुम मुझे तलाश रहे हो....

    बहुत सुन्दर

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