Sunday, September 30, 2012

....बस हो गया प्यार?..........स्मृति जोशी "फाल्गुनी"

कैसे उग आए कांटे
तुम्हारी उस जुबान पर
जिस पर थमा रहता था
मेरे नाम का मधुर शहद,
ठंडे झरने की तरह मेरे गुस्से पर
झर-झर बरसने वाले तुम,


कैसे हो गए अचानक
तड़ातड़ पड़ते अंधड़ थपेड़े की तरह,
रिश्तों के रेगिस्तान में
मैंने तुमसे पाई
कितनी सुखद मीठी छांव,
और तुमने तपती गर्म रेत-से शब्दों से
कैसे छलनी कर देने वाले
किए वार,
बार-बार,
हर बार
....बस हो गया प्यार?



--स्मृति जोशी "फाल्गुनी" 

13 comments:

  1. और तुमने तपती गर्म रेत-से शब्दों से
    कैसे छलनी कर देने वाले
    किए वार,
    बार-बार,
    हर बार
    ....बस हो गया प्यार?
    बहुत ही उम्दा .....

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    1. शुक्रिया राहुल भाई

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  2. बेहद सुन्दर भावाभिव्यक्ति ..

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    1. आभार प्रकाश भाई आपको पसंद आई मेरी पसंद

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  3. बहुत सुन्दर भाव

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    1. आभार दीदी
      शनिवार को नई पोस्ट
      देखियेगा अवश्य

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  4. काँटों के बिना फूल भी सुंदर नहीं लगते न .... अच्छी प्रस्तुति

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    1. आभार दीदी
      अगली पोस्ट स्मृति दीदी के फोटो के साथ

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  5. वाह...बहुत सुंदर..

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  6. बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन

    http://madan-saxena.blogspot.in/
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