Monday, September 24, 2012

आज विश्व बेटी दिवस है.......सुरेश पसारी "अधीर"



भोर की सुनहरी, किरण सी होती है बेटियाँ,
आंगन मे कोयल सी, चहचहाती है बेटियाँ।


बिन बेटियों के, सुना सा लगता है ये आंगन,
पुत्र घर की शान तो, कुल की आन है बेटियाँ।

कर देती है घर को, अपने व्यवहार से रौशन,
मगर व्यथा मन की, कह ना पाती है बेटियाँ।

पहले पिता का घर, फिर अपने ससुराल को,
प्यार से घरो को ,सजाती संवारती है बेटियाँ।

पढ बांच लेना इनके, भोले से सरल मन को ,
सर्वस्व वार देती है, कुलो की आन है बेटियाँ।

बाबुल के घर आंगन, फुदकती है चिरैया सी,
बहू बनके ससुराल की, शान होती है बेटियाँ।

कम ज्यादा का कभी, ये शिकवा नही करती,
जो मिला मिल बाँटकर, खा लेती है बेटियाँ।

उड़ान में तो गगन की, दूरियाँ भी पूरी करले
पर मन को कभी अपने, मार लेती है बेटियाँ।

है दिल मे तूफ़ान भी और सागर की गहराई भी
जिन्दगी की धूप मे शीतल सी छांव है बेटियाँ।

कम मत आंकना "अधीर" इन्के योगदान को,
दुनियाँ मे दो दो कुलों को,तार देती है बेटियाँ।
सुरेश पसारी "अधीर"

9 comments:

  1. बेटियों के बगैर सब कुछ अधूरा है अधीर साहब..
    आपने यकीनन बहुत सुन्दर और मौजू लिखा
    एक नायाब बेटी के कारण ही ये शब्द हम तक पहुँच पाए
    यशोदा जी.....मै सही कह रहा हूँ न ............

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    1. धन्यवाद भाई पंकज

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  3. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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    1. मदन भाई
      मैं लिखती नहीं
      बस पढ़ती हूँ
      अच्छी रचनाओं को यहाँ सहेज लेती हूँ
      नई कविताएँ और ग़ज़ल ढूँढते रहती हूँ
      सादर

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  4. इस सुंदर और सार्थक रचना के लिए बधाई ,बेटियां तो एईसी ही होती है

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    1. सच कहा आपने
      आप और मैं भी तो बेटियाँ ही हैं

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  5. बेटियाँ खुशियाँ नहीं माँगतीं
    खुशियाँ देना चाहती हैं
    ख़ुश रहने से ज़्यादा
    खुशियाँ बाँटना चाहती हैं

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