Monday, October 16, 2017

माँ चुप रह जाती है...............अमित जैन 'मौलिक'

मेरे हालात को मुझसे, पहले समझ जाती है
माँ अब कुछ नहीं कहती, चुप रह जाती है।

तब भी मुस्कराती थी, अब भी मुस्कराती है
माँ चुप रहकर भी, बहुत कुछ कह जाती है।

एक वक्त था जब सब, माँ ही तय करती थी
अब क्या तय करना है, तय नहीं कर पाती है।

तसल्लियों की खूंटी पर, टांग देती है ज़रूरतें
मेरी मुश्किलात माँ, पहले ही समझ जाती है।

जिसे दुश्वारियों के, तूफ़ान भी ना हिला पाये हों
वो अपने बच्चे के, दो आँसुओं में बह जाती है।

मेरी माँ कभी मेरी, जेबें खाली नहीं छोड़ती 
पहले पैसे भरती थी, अब दुआयें भर जाती है।

8 comments:

  1. तसल्लियों की खूंटी पर, टांग देती है ज़रूरतें
    मेरी मुश्किलात माँ, पहले ही समझ जाती है।....मन की बात!

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  2. बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना।माँ शब्द ही इतना स्नेहमयी है कि
    मन एक चिरपरिचित प्रेम से भीग जाता है।

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  3. बहुत बहुत आभार आदरणीया आपका। सभी गुणीजनों का बहुत बहुत शुक्रिया।

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  4. बहुत‎ सुन्दर‎ ....,

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (17-10-2017) को भावानुवाद (पाब्लो नेरुदा की नोबल प्राइज प्राप्त कविता); चर्चा मंच 2760 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण रचना
    पहले पैसे भरती थी,अब दुआएं भर जाती है...
    लाजवाब....

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