Wednesday, October 11, 2017

क्या है मुझ में............नौबहार 'साबिर'

बूंदी पानी की हूं थोड़ी-सी हवा है मुझ में
इस बिज़ाअत पे भी क्या तुर्फ़ां इना है मुझ में

ये जो इक हश्र शबो-रोज़ बपा है मुझ में
हो न हो और भी कुछ मेरे सिवा है मुझ में

सफ़्हे-दहर पे इक राज़ की तहरीर हूं मैं
हर कोई पढ़ नहीं सकता जे लिखा है मुझ में

कभी शबनम की लताफ़त कभा शो'ले की लपक
लम्हा-लम्हा ये बदलता हुआ क्या है मुझ में

शहर का शहर हो जब अर्सए-मशहर की तरह
कौन सुनता है जो कुहराम मचा है मुझ में

वक्त ने कर दिया 'साबिर' मुझे सहरा-ब-किनार
इक ज़माने में समुंदर भी बहा हो मुझ में
- नौबहार 'साबिर'
शब्दार्थः
बिज़ाअत -पूंजी, तुर्फ़ां -विचित्र,  इना -अहं, हश्र -प्रलय, 
शबो-रोज़ -रात-दिन, बपा -मचा हुआ, सफ़्हे-दहर -संसार रूपी पन्ने, तहरीर -लेख, लताफ़त -कोमलता, अर्सए-मशहर -प्रलय क्षेत्र, 
सहरा-ब-किनार - मरुस्थल के अंक में 

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