Sunday, October 1, 2017

व्यथा मन की......प्रकाश लुनावत



समय मेरा गिरवी पड़ा था 
जिम्मेदारी के बाजार में.....
सोचा कुछ पल जी लूँ चुराकर 
ए सनम, तेरे प्यार में..... 
न जाने कैसे आई बात 
तुझसे कुछ इक़रार के 
कहाँ खो गए प्यार के वो पल 
ए प्यार, तेरे प्यार के 

ख्वाब खेल गए खेल अपना 
दिखा गए सपने तुम संग.....
एक नहीं, दो नहीं बल्कि 
भर दिये उसमें अनेको रंग....
अन्त दिखा गए आईना 
सपनो का तार तार के.....
कहाँ खो गए प्यार के वो पल 
ए प्यार, तेरे प्यार के 

कल्पनाओं ने भी वही किया 
ले गए ऊँची उड़ान पर......
हवा महल पर खड़ा करके 
उड़ा दिया बे-लगाम कर......
सिमट गई फिर एक मुट्ठी में 
बना बहाना लाचार के......
कहाँ खो गए प्यार के वो पल 
ए प्यार, तेरे प्यार के 

मजबूरियों ने भी पलट कर 
दिखा दिया कुछ अपना रंग.......
मैंने साथ न दिया उसको 
तो भागकर आई तुम्हारे संग......
बता दिया उसने तुम्हें अपना 
कुछ नियम इस संसार के..... 
कहाँ खो गए प्यार के वो पल 
ए प्यार, तेरे प्यार के 

उठ गया भरोसा खुशी से अब 
यह सब तो बस बेमानी है.....
कभी न करना प्यार किसी से 
यह सब से बड़ी नादानी है....... 
हाँ,  यह सबसे बड़ी नादानी है....... 


प्रकाश लुनावत.... 
रायपुर - 25.09.17

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-010-2017) को
    "अनुबन्धों का प्यार" (चर्चा अंक 2745)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर प्रस्तुति

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