Wednesday, February 22, 2017

रवायत नई, अब समझने लगे हैं...स्वप्नेश चौहान

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मुखौटे एक-एक कर उतरने लगे हैं,
ओ दुनिया तुम्हें हम समझने लगे हैं।

आँखों में अदावत और हाथों का मिलना,
रवायत नई, अब समझने लगे हैं।

बेतकल्लुफ़ी से मिलते थे सब,
अब पहले मिज़ाज परखने लगे हैं।

नई फिज़ा है निज़ाम की अब,
सच बोलने वाले सब खटकने लगे हैं।

भटकते थे पहले अंधेरे में लोग,
अब चकाचौंध में राह भटकने लगे हैं।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 23-02-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2597 में दिया जाएगा |
    धन्यवाद

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  2. सच बोलने वाले तो हमेशा से खटकते हैं ... लाजवाब ग़ज़ल ...

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