Wednesday, September 19, 2018

तुम …-मंजू मिश्रा

अक्सर 
सोचती हूँ... 
तुम्हे 
शब्दों में समेट लूँ 
या फिर
बाँध दूँ ग़ज़ल में 
न हो तो 
ढाल दूँ 
गीत के स्वरों में ही 
मगर 
कहाँ हो पाता है 
तुम तो 
समय की तरह 
फिसल जाते हो 
मुट्ठी से...

- मंजू मिश्रा



22 comments:

  1. है ऐसा कोई
    जो अपने आप सुर बन जाये बनाना ना पड़े
    आपके लबों का.
    है ऐसा कोई जो अपने आप गजल में बंध जाए;बांधना ना पड़े..
    अगर है तो फिर समय से तुलना नहीं करनी पड़ेगी.
    खुबसुरत अभिव्यक्ति.
    आत्मसात 

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    1. धन्यवाद रोहितास जी !

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  2. खूबसूरत रचना जी

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  3. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 20 सितम्बर 2018 को प्रकाशनार्थ 1161 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  4. लाजवाब भावाभिव्यक्ति...

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20.9.18. को चर्चा मंच पर चर्चा - 3100 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  7. बेहतरीन अभिव्यक्ति !

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  8. बहुत सुंदर रचना 👌

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  9. धन्यवाद यशोदा ! मेरी पोस्ट को यहाँ प्रस्तुत करके अापने नए पाठकों से परिचय करवाया । बहुत बहुत आभार

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    1. आदरणीय दीदी
      सादर नमन
      आभार
      आपके पदरज से मेरी धरोहर पवित्र हुई
      सादर

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  10. वाह मंजू जी सुन्दर उद्गार बधाई कैसी हैं

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