Wednesday, September 12, 2018

जाने के ख्वाहिश हैं.....एस. नेहा

क्षितिज के उस पार 
जहाँ  मेरी जाने के ख्वाहिश हैं

वहां न ख्वाहिशों की  बेड़ियाँ हैं 
और न ही रिश्तों का दोहरापन 
वहाँ न ही उम्मीदें हैं 
और न ही किसी प्रकार का सूनापन 

वहां बसता है गर कुछ तो 
बस शांति का एहसास ....
मेरे चेहरे पे अब थकान दिखने लगी हैं 
मेरे आवाज में बेबसी सजने लगी है 
की मुझे ये दुनिया पसंद नहीं 
की मै थक गई हूँ।

अब मुझे इस थकान  को मिटाना है 
आवाज से इस बेबसी को मिटाना है 
कि मैं  जिन बन्धनों में बंध  गई हूँ 
तोड़ देना है उन्हें 
कि मुझे अब चीखना है  जोरों से   
कि मेरा खुदा  सुन सके 

और मेरा मसीहा मुझसे  मिल सके 
की अब तो मुझे क्षितिज के पार ही जाना है 
-एस. नेहा
दस साल पुरानी रचना

10 comments:

  1. वाह बहुत खूब
    इस क्षितिज के पार तो हम सब भी जाना चाहते हैं।जब इसकी कल्पना इतनी अच्छी हैं

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  2. वाह बेहतरीन रचना

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 13.9.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3093 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  4. वाह !!! बहुत शानदार रचना

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  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १४ अगस्त २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  6. गजब।

    उस पार जाना भी मुश्किल है
    बेचैनियों का सफर है।

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  7. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक १७ सितंबर २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  8. रचना अच्छी लगी। वर्तनी में सुधार अपेक्षित हैं।

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