Wednesday, January 25, 2017

पानी........महेश रौतेला


पानी ज़िन्दा लगता है
समुद्र में चलते
उछलते-कूदते, गरजते,
उड़ते हुए, ओस में ढलते
बर्फ़ बनते, बादलों में सरकते
ज़िन्दगी को गीला करते
गले से नीचे उतरते
आँसुओं में झड़ते
नदियों में बहते, ताल में रहते
वृक्षों को सींचते
बरसात में बरसते।
पानी ज़िन्दा लगता है
तुम्हारी, मेरी तरह।



-महेश रौतेला

4 comments:

  1. रौतेला जी सुन्दर रचना प्रस्तुति हेतु धन्यवाद

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  2. आपकी इस प्रस्तुति की लिंक 26-01-2017को चर्चा मंच पर चर्चा - 2585 में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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