Friday, March 1, 2013

तुम से सब.................बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'

जब भी
तुम बिस्तर सो उठकर
महावर लगे पैरों से चलकर
मेंहदी लगे हाथों से
दरवाजा खोलती हो
मेरे शहर में
उषा मुस्कुराने लगती है



जब भी
तुम आँचल संवारती हो
और तुम्हारी चूड़ियां
खनक उठती है
मेरे शहर के मंदिर में
कोई भक्त
मधुर घण्टियां बजाता है..

जब भी
बादल छाने लगते हैं
और मेरी याद सताने लगती है
तुम्हारी आँखें भीगने लगती है
तब मेरे शहर की
नदियों की पुलों पर
पानी छलकने लगता है....


--बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'

8 comments:

  1. जब भी
    तुम आँचल संवारती हो
    और तुम्हारी चूड़ियां
    खनक उठती है
    मेरे शहर के मंदिर में
    कोई भक्त
    मधुर घण्टियां बजाता है.प्रेम का महीन अहसास

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  2. बहुत ही सुन्दर मधुर प्रस्तुति.

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  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (02-03-2013) के चर्चा मंच 1172 पर भी होगी. सूचनार्थ

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    1. शुक्रिया भाई अरुण

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  4. bade hi khoobshurat andaz me khooshurati ko vyakt kati
    prastuti,marmspershi

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  5. चूड़ियां की खनक और मंदिर की मधुर घण्टियां .....बहुत पवित्र सा एहसास जगाती रचना
    अपना पता छोड़ रही हूँ ..कृपया नजर डालें ...
    http://shikhagupta83.blogspot.in/

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  6. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है ......
    सादर ,
    शुभकामनायें .

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

    ये कैसी मोहब्बत है

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  7. दैनिक भास्कर 'मधुरिमा' के प्रेम विशेषांक में प्रकाशित मेरी इस कविता को पसंद करने वाले सभी पाठकों का हार्दिक धन्यवाद।
    - बालकृष्ण गुप्ता 'गुरु'

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