Wednesday, March 21, 2018

वेदना के पाँव में हैं आह के घूंघर.....गीतिका वेदिका



१】
साँस की लड़ियाँ तुड़ाये जा रहे हो!
हाथ हाथों से छुड़ाए जा रहे हो!
तुम बिना पल जिंदगी के
हो चले दूभर

२】
नीर आँखों में समोए, कंठ सूखा रूह प्यासी
जीभ में छाले पड़े हैं, आत्मा में है उदासी
वेदिका के रीतते घट
सूखता पोखर

३】
सामने सूरज चमकता, अंत अंधियारा हुआ,
प्राण का साथी हिराना, चित्त दुखियारा हुआ,
एक बित्ता जोड़ती हूँ
टूटता गजभर

४】
नाम अपना ही लिया था, था तुम्हें कुछ यों पुकारा
टूटकर गिरता नहीं अब आँचरे में कोई तारा

तुम नहीं सुन पा रहे थे
वेदिका के स्वर

#आह_वेदिका

5 comments:

  1. लाजवाब अप्रतिम 👍👍👍👍👍
    मन का एक एक भाव बह गया
    कह गया सारे अवसाद
    कहना सुनना बहुत हो गया
    तुम बिन भाये न कोई बात ।

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  2. बहुत सुन्दर...

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  3. आदरणीया यशोदा जी के कोमल भावनाओं को अभिव्यक्त करती खूबसूरत रचना... 'वेदना के पांव में...'
    कुछ पंक्तियां जोड़ने का दुस्साहस कर रहा हूँ..

    5-
    नीम की फुनगी पे बैठी गा रही कोयल,
    और ताने दे कलेजा बेधती पल- पल,
    तुम नहीं तो दौड़ता है, काटने को घर
    तुम बिना पल जिंदगी के हो चले दूभर
    6-
    आह! मेरा कौन, किससे मैं व्यथा गाउँ
    या हृदय को भींच कर मैं मौन रह जाऊँ
    पर बुझेगी हाय कैसे? आग है अंदर
    तुम बिना पल जिंदगी के हो चले दूभर

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