Tuesday, March 6, 2018

परिक्रमा....डॉ. भावना कुँअर


परिक्रमा!
तुम यहाँ
तुम यहाँ क्यों खड़ी हो
अभी तो तुम वहाँ थी
ये कैसे सम्भव है
कि तुम दोनों जगह मौजूद हो
क्योंकि तुम तो एक हो
अभी तो सुख से विलीन थी
अब यहाँ दु:ख से आसक्त हो
असम्भव है ये
तुम्हारा दोनों जगह होना
क्या?
सुख दु:ख का
पाठ पढ़ा रही हो!
या व्यर्थ ही
चक्कर लगा रही हो!
कभी तो तुम
दो दिलों को
एक करने के लिये
अग्नि के फेरे लगा रही हो
कभी विरह व्यथा में जलते हुए
पिता का पुत्र से वियोग दिला रही हो

-डॉ. भावना कुँअर

2 comments:

  1. बहुत खूब भावना कुंवर की ये रचना

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (07-03-2018) को ) "फसलें हैं तैयार" (चर्चा अंक-2902) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    ReplyDelete