Wednesday, March 28, 2018

तन्हाई....सीमा ‘असीम’ सक्सेना


जब तन्हाई छा जाती है 
नींद कहीं दूर उड़ जाती है 
वक्त की धुरी लगातार बदलती जाती है 
सज जाती है यादों की महफ़िल 
जो सुख दुःख, धुप छाँव सी 
मन को सहलाती है 
याद कभी बादल बन बरसती है 
कभी धुप बन होठों पर खिल आती है 
खुद से ही हँसना, रोना, गाना और बतियाना 
यादों की लम्बी सैर पर निकल जाना 
रात का सन्नाटा भीतर भर जाता है 
जब तन्हाई आती है 
यह बहुत सताती, रुलाती और तड़पाती है!!


-सीमा ‘असीम’ सक्सेना

5 comments:

  1. वाह !!! बहुत खूब सुंदर

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  2. बेहतरीन बेहतरीन बेहतरीन !!!
    हर एक पंक्ति लाजवाब है।
    मानों अनुभवों की लड़ी बना दी है आपने । मैने इसको अनुभव किया है।
    बहुत ही प्रासंगिक रचना ।

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  3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 29.3.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2924 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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