Saturday, July 30, 2016

विरह-वेदना............शैफाली गुप्ता



चांद सजाऊं
या आकाश बिछाऊं
न पाती तुम्हें ।1।

तुम हो आत्मा
तुम्हीं हो धड़कन
फिर भी कहां ? ।2।


नीला आकाश-
उसके विस्तार में
डूबती-सी मैं । 3 ।



क्या याद तुम्हें
आसमान का रंग
नीलिमा-सी मैं ।4।


स्याही का रंग
उकेरती पन्नों पे
सोचती तुम्हें । 5।


स्पर्श तुम्हारा
स्पंदन बन जीता
आत्मा में मेरी । 6।


रंग-विहीन
जो जीवन हो मेरा
रंग तुम्हीं तो ।7।


तेरा न होना
या तेरा क्यूं न होना
प्रश्न ये मेरा ।8।


नए-पुराने
शब्द-ग्रंथ तुम्हीं हो
फिर भी कहां।।9।।

- शैफाली गुप्ता


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