Thursday, July 21, 2016

हूं मैं एक फूल सी..........तरसेम कौर
















जितना घिसती हूं 
उतना निखरती हूं
परमेश्वर ने बनाया है मुझको 
कुछ अलग ही मिट्टी से

जैसा सांचा मिलता है 
उसी में ढल जाती हूं
कभी मोम बनकर 
मैं पिघलती हूं
तो कभी दिए की जोत 
बनकर जलती हूं

कर देती हूं रोशन 
उन राहों को 
जो जि‍द में रहती हैं 
खुद को अंधकार में रखने की
पत्थर बन जाती हूं कभी
कि बना दूं पारस 
मैं किसी अपने को
रहती हूं खुद ठोकरों में पर
बना जाती हूं मंदि‍र कभी 
सुनसान जंगलों में भी

हूं मैं एक फूल सी
जिस बिन 
ईश्वर की पूजा अधूरी
हर घर की बगिया अधूरी..!!

-तरसेम कौर


4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (21-07-2016) को "खिलता सुमन गुलाब" (चर्चा अंक-2410) पर भी होगी।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत सुन्दर

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  3. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 22/07/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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