Sunday, September 21, 2014

ख़्वाब में कल डाँट कर गए...........आलोक श्रीवास्तव



अब तो ख़ुशी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा
आसूदगी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

सब लोग जी रहे हैं मशीनों के दौर में
अब आदमी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

आई थी बाढ़ गाँव में, क्या-क्या न ले गई
अब तो किसी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

घर के बुज़ुर्ग लोगों की आँखें ही बुझ गईं
अब रौशनी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा

आए थे मीर ख़्वाब में कल डाँट कर गए
‘क्या शायरी के नाम पे कुछ भी नहीं रहा?’

- आलोक श्रीवास्तव

प्राप्ति स्रोतः काव्यांचल

7 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 22/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. बहुत सुन्दर

    खुशी के नाम पर खुद को लुटा दिया
    कर के तन्हां खुद को भुला दिया
    उम्मीदे चराग जलाता भी तो कैसे
    घर के चरागों घर को जला दिया

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  3. आलोक जी बुजुर्गो के बारे मे आपके ख्यालात पढ कर बहुत खुशी हुयी.....

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  4. Bilkul sahi kaha aapne sab mashini robert ki tarah ho gyein hai.... Bin samvedana ke hai aaj aadmi,,,, umda saarthak prbhaawi rchna!!

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  5. वाह बहुत सुन्दर

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