Wednesday, September 24, 2014

तुमने चख लिया हर रंग का लहू.......अजन्ता देव














तुम्हारी जिव्हा
ठांव-कुठांव टपकाती है लार
इसे काबू में रखना तुम्हारे वश में कहां
तुमने चख लिया हर रंग का लहू


परन्तु एक बार आओ
मेरी राम रसोई में
अग्नि केवल तुम्हारे जठर में
नहीं, मेरे चूल्हे में भी है
ये पृथ्वी स्वयं हांडी बनकर
खदबदा रही है


केवल द्रौपदियों को ही
मिलती है यह हांडी
पांच पतियों के
परम सखा से

- अजन्ता देव


..... नायिका से... 

11 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 25/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25-9-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1747 में दिया गया है
    आभार

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  3. द्रौपदी को हर युग में हांडी मिलही जाती है.सखा कोई भी हो .
    सुन्दर रचना के लिए बधाई.

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  4. बहुत सशक्त अभिव्यक्ति...

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  5. अनुपम भाव, सशक्त शब्द संयोजन, उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ! अति सुन्दर !

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  6. सही भाव, सही रचना।

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  7. सुंदर अर्थ ,सुंदर भाव..,सुंदर कविता....

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  8. उत्कृष्ट भावो को व्यक्त करती बेहतरीन रचना

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  9. ,सुंदर भाव..,सुंदर कविता....

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