Tuesday, September 16, 2014

चांद मेरा वक़ील हो जैसे....नवनीत शर्मा

 

उसकी आंखों में झील हो जैसे
प्‍यास ? मुद्दत क़लील हो जैसे

ढूंढना उसको…कोई अंत नहीं
एक सहरा तवील हो जैसे

उसको देखा तो हो गये पत्‍थर
पांव रखना भी मील हो जैसे

सांस लेने में जान जाती है
कोई इतना अलील हो जैसे

फ़ैसला उसके हक़ में होना था
उसका चेहरा दलील हो जैसे

धूप की सब अदालतों के लिए
चांद मेरा वक़ील हो जैसे

उतर आया सलीब से लेकिन
अब तो सब दिल ही कील हो जैसे

ख़ूब दौड़ा कहीं नहीं पहुंचा
दिल-हिरन ही में ढील हो जैसे

उस तक आवाज़ जा नहीं पाती
दरमियां इक फ़सील हो जैसे

डर गया मुश्किलों से इतना मैं
छोटी चिड़िया भी चील हो जैसे

ख़ाब के खो चुके जज़ीरों की
याद ही संगे-मील हो जैसे

-नवनीत शर्मा 09418040160

 http://wp.me/p2hxFs-1Oq

16 comments:

  1. वाह .............................

    फ़ैसला उसके हक़ में होना था
    उसका चेहरा दलील हो जैसे

    उस तक आवाज़ जा नहीं पाती
    दरमियां इक फ़सील हो जैसे

    डर गया मुश्किलों से इतना मैं
    छोटी चिड़िया भी चील हो जैसे


    आज का हो गया मेरा ब्लॉग देखना ...अब इससे बेहतर नहीं मिलेगा.

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    1. सबसे पहले 4Yashoda.blogspot.in का आभार कि नाचीज़ की ग़ज़ल को इतना स्‍नेह और सम्‍मान दिया। मित्र रोहितास जी का भी आभार।

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवार के - चर्चा मंच पर ।।

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    1. रविकर जी। मशकूर हूं।

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  3. फ़ैसला उसके हक़ में होना था
    उसका चेहरा दलील हो जैसे ....अति अभिव्यक्ति नवनीत जी!
    धरती की गोद

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    1. आदरणीय संजय जी, आभार।

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  4. रूबरू आईना औ आईने तस्वीर..,
    मेरे ख्वाबों की तकमील हो जैसे.....

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  5. चांद मेरा वकील हो जैसे--
    सुंदर

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    1. बहुत आभारी हूं।

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  6. बहुत खूब शर्मा जी

    सादर

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    1. आ. यशवंत जी। बहुत ममनून हूं।

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  7. आज की भागदौड़ भरी जिंद़गी में जहां साया भी साये की तलाश में रहता है। अाप जैसे कुछ लोगों को देख कर जीवन के प्रति आस्‍था बढ़ती है... अपने प्रति भरोसा जगता है और लगता है... कुछ तो है कि यह दुनिया चल रही है। मेरी ग़ज़ल को स्‍नेह और मान देने के लिए मैं य
    शवंत यश जी, यशोदा अग्रवाल जी और दिग्‍विजय अग्रवाल जी का आभारी हूं।
    सादर
    नवनीत शर्मा

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