Friday, September 19, 2014

सपने भी टूटे तो क्या...............शाश्वत




  स्याही सूखी, कलम भी टूटी,
सपने भी टूटे तो क्या,
अभी शेष समंदर मन में,
आंसू भी सूखे तो क्या।

पत्ता-पत्ता डाली-डाली,
बरगद भी सूखा तो क्या,
जड़े शेष जमीं में बाकी,
गुलशन भी सूखा तो क्या,

स्याही सूखी, कलम भी टूटी,
सपने भी टूटे तो क्या,

अपने रूठे, सपने झूठे,
जग भी छूट गया तो क्या,
जन्मों का ये संग है अपना,
छूट गया इक जिस्म तो क्या

स्याही सूखी, कलम भी टूटी,
सपने भी टूटे तो क्या।

-शाश्वत

13 comments:

  1. रिश्तें टूटे नाते छूटे
    जीवन विखरा गया तो भी क्या
    कफ़न अभी जलना बाकी है
    चिता जल गई तो भी क्या



    टूटी नहीं सांस अपनी है
    सपने बिखर गये तो भी क्या
    ज़िंदा आस अभी पूरी है
    मौसम रूठ गया तो भी क्या

    है कलम अभी तक ज़िंदा देखो
    स्याही रूठ गई तो भी क्या
    लिखने का ज़ज़्बात है बाकी
    हाथ कट गए तो भी क्या

    चलो चलें आगे बढ़ना है
    रस्ते रूठ गए तो भी क्या
    नज़र टिकी है मंज़िल पर
    रहबर छूट गए तो भी क्या
    आँखों में हैं कशिश प्यार की
    चेहरे रूठ गए तो भी क्या
    अश्कों में है अक्श किसी का
    दर्पण टूट गए तो भी क्या



    मधु "मुस्कान "









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  2. सत्य का आभास कराती शाशवत रचना...

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  3. ओले गिरे
    आंधियां चली
    बाण भी चलें
    अटूट बंधन पर तो क्या।

    खुबसुरत रचना।
     पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. वाह ! इसे कहते हैं सच्ची जिजीविषा ! जो कुछ बाकी है वही अनमोल है वही सर माथे है ! इतनी सुन्दर रचना साझा करने के लिये आपका शुक्रिया यशोदा जी !

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-09-2014) को "हम बेवफ़ा तो हरगिज न थे" (चर्चा मंच 1742) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  8. अपने रूठे, सपने झूठे,
    जग भी छूट गया तो क्या,
    जन्मों का ये संग है अपना,
    छूट गया इक जिस्म तो क्या...!!!
    सुंदर रचना के लिए बधाई ...!

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  9. बहुत ही बढ़िया

    सादर

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