Thursday, September 25, 2014

कैसा-कैसा दर्द रिसता है..........यशोदा

 











विचित्र है..
और सत्य भी तो है,
कि हजारों वर्ष के
इतिहास नें कभी भी,
किसी ने भी
नारी की आर्थिक स्थिति की
ओर ध्यान ही नहीं दिया

और .......
इसी के चलते
देश की बेटियां,
बहनें और माताओं को
इसी अर्थव्यवस्था
के चलते समाज में
हीन भावनाओं और
दासत्व से ग्रषित ही रही.

दासप्रथा के मूल में
नारी के प्रति
असहिष्णुता ही है
और यह
सामाजिक सोच है
जो स्त्रियों और पुरुषों को
अलग अलग नियमों के
खाकों में जकड़ देती है
और पुरुष कभी
देख और सुन ही नहीं पाता

और..........
वहीं स्त्री भीतर
कितना और
कैसा-कैसा दर्द रिसता है,
इसकी भावनात्मक वेदना
तो दूर मानवता के नाते
गहरी संवेदना भी
नहीं उपजती
जो की.....
उपजनी चाहिये

मन की उपज
-यशोदा

4 comments:

  1. व्यथा और वेदना के परिधान में आवृत्त नारी

    हाय अबले तेरे जीवन की यही कहानी है
    आंचल में है दूध और आँखों में पानी है

    इस मिथक को तोडना है और टूटना प्रारंभ भी हो गया है

    उम्मीद की किरण अभी जिंदा है नारी जीवन से तिमिर और निराशा के मेघ को हटाना ही होगा

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (26.09.2014) को "नवरात महिमा" (चर्चा अंक-1748)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद। नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें।

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  3. Bahut sunder abhivyakti.... Adhikaar ke naam par aurat ko shuny kaar diya jata hai ... Kartavyo k naam par sadev stri ko sarvpari rakkha jaata hai... yahi naari ki dasha hai....!!

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  4. kya gazab abhvyakti hai rachna ki... bahut hi gahra sandesh sochne ko majbur karta

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