Wednesday, August 28, 2013

उमड़ते आते हैं शाम के साये..........इब्ने इंशा


उमड़ते आते हैं शाम के साये
दम-ब-दम बढ़ रही है तारीकी
एक दुनिया उदास है लेकिन
कुछ से कुछ सोचकर दिले-वहशी
मुस्कराने लगा है- जाने क्यों ?
 
वो चला कारवाँ सितारों का
झूमता नाचता सूए-मंज़िल
वो उफ़क़ की जबीं दमक उट्ठी
वो फ़ज़ा मुस्कराई, लेकिन दिल
डूबता जा रहा है - जाने क्यों ?

-इब्ने इंशा
उफ़क़=क्षितिज; जबीं=मस्तक 

इब्ने इंशा
जन्म: 15 जून,1927, फ़िल्लौर, जिला जालंधर, पंजाब
निधन: 11 जनवरी,1978, लन्दन, यू के


कुछ प्रमुख कृतिः    
इस बस्ती के एक कूचे में, चाँद नगर, दुनिया गोल है, 
उर्दू की आख़िरी किताब

ये रचना सौजन्यः रसरंग, दैनिक भास्कर
 

7 comments:

  1. शुभप्रभात छोटी बहना
    दही-हांडी की हार्दिक शुभकामनाए

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    सभी पाठकों को हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच} परिवार की ओर से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    --
    सादर...!
    ललित चाहार

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  3. waah...is post ke liye dhanyavad. Janmashtami ki hardik shubhkamnayein...

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  4. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें,सादर!!

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  5. बहुत ही सुन्‍दर

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