Sunday, January 3, 2016

सोचो ख़ुद को तराशा क्या....अनुराग सिंह


मानव की परिभाषा क्या
अन्तःमन की भाषा क्या
निराशा तो आनी ही है
नहीं तो जीवन की आशा क्या

कुछ भावों के संग्रह से
मानव मन के अनुग्रह से
स्वप्न विघटित होते ही हैं
नहीं तो फिर अभिलाषा क्या

गिरते नहीं तो सँभालते क्या
डरने वाले फिर चलते क्या
तुम ख़ुद ही ख़ुद के परखी हो
सोचो ख़ुद को तराशा क्या

मन में है ये नफ़रत क्यूँ
इंसान की ऐसी फ़ितरत क्यूँ
छोटा सी ही ये जीवन है
उसमें जीना ज़रा सा क्या
-अनुराग सिंह

नाम : अनुराग सिंह

शिक्षा : आईआईआईटी अलाहाबाद से एम.एस.
इस समय एम.ए. (हिन्दी) के विद्यार्थी
संप्रति : आरआरएसआईएमटी में असिटेंट प्रोफ़ेसर
सम्पर्क : anurag17889@gmail.com


7 comments:

  1. बहुत बढ़िया

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सियाचिन के परमवीर - नायब सूबेदार बाना सिंह - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. जय मां हाटेशवरी...
    आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...

    इस लिये दिनांक 04/01/2016 को आप की इस रचना का लिंक होगा...
    चर्चा मंच[कुलदीप ठाकुर द्वारा प्रस्तुत चर्चा] पर...
    आप भी आयेगा....
    धन्यवाद...

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  4. मन में है ये नफ़रत क्यूँ
    इंसान की ऐसी फ़ितरत क्यूँ
    छोटा सी ही ये जीवन है
    उसमें जीना ज़रा सा क्या
    -..बहुत सुन्दर ..जिवो तो बिंदास

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  5. सुन्दर व सार्थक रचना...
    नववर्ष मंगलमय हो।
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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