Sunday, December 30, 2012

स्वीकार करना सीखिए.......सुरेश अग्रवाल 'अधीर'


जिंदगी में इस तरह आप,
ना कभी रोना सीखिए,
जिस तरह की दे रब जिंदगी,
उसे जीना सीखिए ।

फूलों की सी सेज होती नहीं है,
हर वक्त जिंदगी ,
ग़म, बेबसी, काँटे तो क्या,
गले लगाना सिखिये ।

त्याग समर्पण भी है जरूरी
एक सच्चे प्यार में ,
प्यार पाने से पहले,
प्यार को खोना भी सीखिए।

बेवफाई ,आंसू,उदासी गर,
दे गया वो तो ग़म नही,
इश्क में चलता है ये सब,
स्वीकार करना सीखिए।

काँटे भी चुभेंगे दामन में,
अगर करोगे प्यार तुम,
ये सब चाहते नही ज़नाब,
फिर दूर रहना सीखिए। 

-सुरेश अग्रवाल 'अधीर'

17 comments:

  1. जीवन को सुख-दुःख की समरसता के साथ जीने की सीख देती एक खूबसूरत रचना,इश्वर का दिया यह जीवन अपने हर रूप सुंदर है बस समझने वाली दृष्टि चाहिए ---धन्यवाद

    ReplyDelete
  2. काँटे भी चुभेंगे दामन में.....
    जिन्दगी को ख़ूबसूरती से बयाँ करती रचना...

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्वागतम राहुल भाई

      Delete
  3. खूबसूरत रचना. जिंदगी में इस तरह आप,
    ना कभी रोना सीखिए,
    जिस तरह की दे रब जिंदगी,
    उसे जीना सीखिए ।

    फूलों की सी सेज होती नहीं है,
    हर वक्त जिंदगी ,
    ग़म, बेबसी, काँटे तो क्या,
    गले लगाना सिखिये ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आभार सुरेश भाई का
      जो ये रचना मेरे ब्लाग मे पोस्ट हुई

      Delete
  4. yashoda , di...apke sneh se abhibhut hu ...bigad jayega apka bhai ...sukriya apka ...

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्वीकार करना सीखिये..........
      बुध की पोस्ट मे डालना था
      सो इसे ही पोस्ट कर दी मैं

      Delete
  5. yashoda , di...apke sneh se abhibhut hu ...bigad jayega apka bhai ...sukriya apka ...

    ReplyDelete
  6. त्याग समर्पण भी है जरूरी
    एक सच्चे प्यार में ,
    प्यार पाने से पहले,
    प्यार को खोना भी सीखिए।

    बहुत सुन्दर सन्देश

    ReplyDelete

  7. बढ़िया गजल संवाद करती आसपास से स्वगत कथन का अतिक्रमण करती हुई .

    ReplyDelete
  8. दिन तीन सौ पैसठ साल के,
    यों ऐसे निकल गए,
    मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण,
    ज्यों कहीं फिसल गए।
    कुछ आनंद, उमंग,उल्लास तो
    कुछ आकुल,विकल गए।
    दिन तीन सौ पैसठ साल के,
    यों ऐसे निकल गए।।
    शुभकामनाये और मंगलमय नववर्ष की दुआ !
    इस उम्मीद और आशा के साथ कि

    ऐसा होवे नए साल में,
    मिले न काला कहीं दाल में,
    जंगलराज ख़त्म हो जाए,
    गद्हे न घूमें शेर खाल में।

    दीप प्रज्वलित हो बुद्धि-ज्ञान का,
    प्राबल्य विनाश हो अभिमान का,
    बैठा न हो उलूक डाल-ड़ाल में,
    ऐसा होवे नए साल में।

    Wishing you all a very Happy & Prosperous New Year.

    May the year ahead be filled Good Health, Happiness and Peace !!!

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुभ कामनाएँ आपको भी
      आभार

      Delete
  9. बहुत भावपूर्ण रचना |नव वर्ष शुभ और मंगल माय हो |

    ReplyDelete
  10. बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..
    नववर्ष की शुभकामनायें

    ReplyDelete
  11. बेवफाई ,आंसू,उदासी गर,
    दे गया वो तो ग़म नही,
    इश्क में चलता है ये सब,
    स्वीकार करना सीखिए।

    आय ... हाय हाय क्या गजब लिख दिए हो ...एक भुगतभोगी ही ऐसा लिख सकता हैं।
    यशोदा जी आपका बहुत बहुत आभार !!

    यहाँ पर आपका इंतजार रहेगा शहरे-हवस

    ReplyDelete