Sunday, December 23, 2012

तोड़ कर झिझोड़ दिया क्यूँ.......इतनी वहशत से .....अलका गुप्ता

हौसले अरमान सभी होंगे पूरे एक दिन इक आस थी |
समेट लुंगी बाहों में खुशियाँ सारी यही इक आस थी ||

तोड़ कर झिझोड़ दिया क्यूँ.......इतनी वहशत से |
देखे दुनियाँ तमाशबीन सी ना मन को ये आस थी ||

टूट गई हूँ ...विकल विवश सी मन में इतनी दहशत है |
शर्म करो उफ्फ !!! प्रश्नों से..जिनकी ना कोई आस थी ||

घूम रहे स्वच्छंद अपराधी देखो !!! भेड़िये की खाल में |
बन गई अपराधिनी...मैं ही कैसे..इसकी ना आस थी ||

मानवता से करूँ घृणा या देखूं हर मन को संशय भर |
रक्षक समझी थी ना विशवासघात की मन को आस थी ||

मिलती नहीं सजा क्यूँ....समझ ना पाय 'अलका' यह |
इन घावों की सजा दे कोई...जिसकी दिल को आस थी ||

--अलका गुप्ता

6 comments:

  1. behatreen " sb bhediye ab dilli me hajir ho gye,bn jishm ke saudagar ma betio ko kha gye..." घूम रहे स्वच्छंद अपराधी देखो !!! भेड़िये की खाल में |
    बन गई अपराधिनी...मैं ही कैसे..इसकी ना आस थी ||

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  2. मानवता से करूँ घृणा या देखूं हर मन को संशय भर |
    रक्षक समझी थी ना विशवासघात की मन को आस थी |

    behtareeen...!

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  3. सोचकर ही बदन मे सिहरन सी दोङने लगती है
    ऐसे पिशाचों को ज़मीन पे भेजा ही क्यूँ रब ने।
    http://ehsaasmere.blogspot.in/

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    1. सुन्दर
      कभी-कभी आ जाया करो

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  4. हार्दिक धन्यवाद !!!!

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    1. आपकी रचना पर आपकी प्रतिक्रिया
      स्वागतम

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