Saturday, February 9, 2013

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम.........अधीर

यहॉ कब कौन किसका हुआ है ,
इंसान जरुरत से बंधा हुआ है ।

मेरे ख्वाबो मे ही आते है बस वो,

पाना उसको सपना बना हुआ है।

सुनो,पत्थर दिलो की बस्ती है ये,
तू क्यो मोम सा बना हुआ है ।

खुदगर्ज है लोग इस दुनिया मे,
कौन किसका सहारा हुआ है ।

कहने को तो बस अपना ही है वो,
दिलासा शब्दो का बना हुआ है ।

लोहा होता तो पिघलता शायद,
इंसान पत्थर का बना हुआ है।

जीत ने का ख्वाब देखा नही कभी,
हारने का बहाना एक बना हुआ है ।

नही होता अब यकीन किसी पर भी,
इंसान तो जैसे हवा बना हुआ है।

लगाके गले वो परायो को शायद,
अंजान अपनो से ही बना हुआ है।

छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम,
ठोकर खाकर "अधीर" संभला हुआ है । 
----अधीर 
यह प्रस्तुति ब्लाग धरोहर से स्थानान्तरित की गई है

4 comments:

  1. छोड़ो मेरे दर्दे-ए-दिल की फिक्र तुम,
    ठोकर खाकर "अधीर" संभला हुआ है ।
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  2. लोहा होता तो पिघलता शायद,
    इंसान पत्थर का बना हुआ है।
    बहुत सुन्दर रचना!

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  3. बहुत ही सुंदर ..

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  4. आपकी रचना निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें।

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