Wednesday, February 20, 2013

महक उठी थी केसर..........................फाल्गुनी

खिले थे गुलाबी, नीले,
हरे और जामुनी फूल
हर उस जगह
जहाँ छुआ था तुमने मुझे,
महक उठी थी केसर
जहाँ चूमा था तुमने मुझे,
बही थी मेरे भीतर नशीली बयार
जब मुस्कुराए थे तुम,

और भीगी थी मेरे मन की तमन्ना
जब उठकर चल दिए थे तुम,
मैं यादों के भँवर में उड़ रही हूँ
अकेली, किसी पीपल पत्ते की तरह,

तुम आ रहे हो ना
थामने आज ख्वाबों में,
मेरे दिल का उदास कोना
सोना चाहता है, और

मन कहीं खोना चाहता है
तुम्हारे लिए, तुम्हारे बिना।
 
---------स्मृति आदित्य "फाल्गुनी"

पुनः प्रकाशन धरोहर से

12 comments:

  1. मधुस्मृति में मन बार बार जाना चाहता है.अति सुन्दर एहसास
    latest post पिंजड़े की पंछी

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  2. सुंदर रचना ....!!
    शुभकामनायें ...

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  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति,आभार.

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  4. बहुत सुन्दर कथ्य -
    शुभकामनाएं ||

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  5. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति,आभार.

    नज़रों ने नज़रों से नजरें मिलायीं
    प्यार मुस्कराया और प्रीत मुस्कराई

    प्यार के तराने जगे गीत गुनगुनाने लगे
    फिर मिलन की ऋतू आयी भागी तन्हाई

    दिल से फिर दिल का करार होने लगा
    खुद ही फिर खुद से क्यों प्यार होने लगा

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  6. मन कहीं खोना चाहता है
    तुम्हारे लिए ..
    --------------------------
    एकदम मन के एहसास में भींगी हुई .. दिव्य ...

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  7. बहुत सुन्दर....
    कोमल अभिव्यक्ति..

    अनु

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  8. बहुत सुन्दर वहा वहा क्या बात है अद्भुत, सार्थक प्रस्तुरी
    मेरी नई रचना
    खुशबू
    प्रेमविरह

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  9. बहुत सुन्दर!
    यशोदा बहन, अब आपका स्वास्थ्य कैसा है?

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  10. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है ......
    सादर , आपकी बहतरीन प्रस्तुती

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    पृथिवी (कौन सुनेगा मेरा दर्द ) ?

    ये कैसी मोहब्बत है

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