Sunday, February 10, 2013

सुकूं बांकपन को तरसेगा...............................??????????



एक निवेदनः
कोई सामान घर में एक कागज में पेक करके लाया गया वह कागज मेरी नजर में आया, उसी कागज में ये ग़ज़ल छपी हुई थी, पर श़ाय़र का नाम नहीं था. आप सभी से ग़ुज़ारिश है यदि किसी को इस ग़ज़ल के श़ाय़र का नाम मालूम हो तो मुझे बताएं ताकि मैं श़ाय़र का नाम लिख सकूं...शुक्रिया...यशोदा



जबान सुकूं को, सुकूं बांकपन को तरसेगा,
सुकूंकदा मेरी तर्ज़-ऐ-सुकूं को तरसेगा.

नए प्याले सही तेरे दौर में साकी,
ये दौर मेरी शराब-ऐ-कोहन को तरसेगा.

मुझे तो खैर वतन छोड़ के अमन ना मिली
वतन भी मुझ से गरीब-उल-वतन को तरसेगा

उन्ही के दम से फरोज़ां पैं मिलातों के च़राग
ज़माना सोहबत-ए-अरबाव-ए फन को तरसेगा

बदल सको तो बदल दो ये बागबां वरना
ये बाग साया-ए-सर्द-ओ-समन को तरसेगा

हवा-ए-ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन
ज़मीं पानी को सूरज़ किरण को तरसेगा
ग़ज़ल कार....अज्ञात 
पुनः प्रकाशन...धरोहर से

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर बहन! आपका साहित्य के प्रति यह समर्पण निश्चित ही साहित्य को एक नई दिशा देगा।

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  2. बहुत सुन्दर**** बदल सको तो बदल दो ये बागबां वरना
    ये बाग साया-ए-सर्द-ओ-समन को तरसेगा

    हवा-ए-ज़ुल्म यही है तो देखना एक दिन
    ज़मीं पानी को सूरज़ किरण को तरसेगा

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (11-02-2013) के चर्चा मंच-११५२ (बदहाल लोकतन्त्रः जिम्मेदार कौन) पर भी होगी!
    सूचनार्थ.. सादर!

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  4. अमीर खुसरो साहब का असर है गजल पर मजा आ गया .

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  5. बेहतरीन गजल है..

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  6. आपकी रचना निर्झर टाइम्स पर लिंक की गयी है। कृपया इसे देखें http://nirjhar-times.blogspot.com और अपने सुझाव दें।

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    धन्यवाद
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