Saturday, October 17, 2020

एक मुस्कान में बिकता हूँ... -विनय के. जोशी

भले ही नागफनी सा दिखता हूँ.
ग़ज़ल बड़ी मखमली लिखता हूँ..

क़दर नहीं, पर हासिल भी नहीं.
वैसे, एक मुस्कान में बिकता हूँ..

फूलों की खबर रूहों को देनी है
पवन हूँ, एक जगह कहाँ टिकता हूँ

कामयाब बुर्ज पर परचम तुम्हारा
मैं शिकस्तों के गांव में छिपता हूँ

यकजां आईने में अक्स बिखरा था
हुई जो किरचें, तो साफ दिखता हूँ
-विनय के. जोशी..

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