Friday, June 23, 2017

प्रतिभा बहुत है.....निधि सक्सेना









एक दिन हमारे हाथ की रेखाएं पढ़ कर
एक ज्योतिष महाराज कहने लगे
प्रतिभा बहुत है
परंतु रेखायें इंगित कर रही हैं 
यश और गौरव नही हैं
प्रशस्ति लौट लौट जाती है
बृहस्पति बहुत हल्का है
वही कीर्ति रोक रहा है..

पुखराज पहने तर्जिनी में
भाग्य घुटनों के बल चल कर आएगा
सोया बृहस्पति जागेगा..
हमनें सोचा
वो भाग्य ही क्या
जिसे कोई पत्थर जगाये

अगर भाग्य हमारा है
और हमें उसे जगाने की इच्छा है
तो यथेष्ट कर्म भी हमें ही करने होने..

अगर हमारा भाग्य एक छोटा सा पत्थर जगा सकता है
तो हम क्यों नही..
वैसे भी अपने भाग्य को जगाने सुलाने की
और फल निष्फल की जिम्मेदारी
हमारी है 
बेचारे पुखराज की थोड़ी है..

सो हमने रेखाओं पर एक दॄष्टि डाली 
महाराज को प्रणाम किया
हाथ झाड़ा और चले आये...
अपने यश की तृष्णा के लिए
आँखो पर पट्टी बाँध
किसी पत्थर का अनुगामी बनना 
हमे मंज़ूर नही...
~निधि सक्सेना

7 comments:

  1. वाह!!!
    बहुत खूब....

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  2. एक विचारणीय पहलू को उजागर करती रचना। जिंदगी को जीने का एक ढंग यह भी। खूबसूरत रचना।

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  3. शाब्बाश , मंगलकामनाएं !

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  4. वाह !!!निधि जी ,कया खूब कहा ।अभिनन्दन...

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  5. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार (25-06-2016) को "हिन्दी के ठेकेदारों की हिन्दी" (चर्चा अंक-2649) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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