Saturday, June 10, 2017

अब उसके एक पूँछ ऊग आई है....निधि सक्सेना











उसने ब्याह किया
और समझा कि अब वो पूर्ण हुआ
कि अब उसके एक पूँछ ऊग आई है
जो हमेशा उससे बँधी रहेगी
हर वक्त उसके पीछे चलेगी..
उसकी सफलता पर
मगन मस्त हिलेगी..
उसकी ख़ुशी में नाचेगी..
उसकी उदासी में
सीधी लटक जायेगी..
जब किसी अजनबी से मुख़ातिब होगा
सहम कर दुबक जायेगी..
जब कभी उद्विग्न होगा
डर कर पैरों में घुस जायेगी..
उसके हर भाव को अचूक अभिव्यक्त करेगी..
हाँ वो एक हद तक अच्छी पूँछ साबित हुई
और वो विशुद्ध ????
~निधि सक्सेना

8 comments:

  1. उसे पूंछ उग आयी और उसे भी मूँछ.
    फिर दोनों की बढ़ गयी सामाजिक पूछ!
    ....... हा हाहाहा ......बहुत बढ़िया !!!

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-06-2017) को
    "रेत में मूरत गढ़ेगी कब तलक" (चर्चा अंक-2643)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    ReplyDelete
  3. सुंदर प्रतीकात्मक कविता.. बढ़िया

    ReplyDelete
  4. सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  5. वह तो अच्छी पूँछ ही साबित होती आयी है....
    अपना अस्तित्व खोकर....
    सिर्फ पूँछ बनकर ही रह गयी....
    सुन्दर व्यंगात्मक रचना...।

    ReplyDelete