Friday, August 1, 2014

उदासी भरी शाम ढ़लती रही.......प्रदीप दीक्षित


साहिल की उम्मीद बाँधकर कश्ती चलती रही,
एक बेमानी सी जिगर मेँ पलती रही।

लौटने वाले चले गये रास्तोँ को अकेले छोड़कर,
उनकी याद मेँ उदासी भरी शाम ढ़लती रही।

आकर देख लो इस सिसकती जिन्दगी की तस्वीर,
जिसके बिखरते रंगो मेँ आरजू पिघलती रही।

सोच कर चला था कैद कर लूंगा तेरे अक्स को,
देखा तो दूर से तेरी परछाईँ गुजरती रही।

-प्रदीप दीक्षित

फेसबुक से

5 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज शनिवासरीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. कुछ पंक्तियाँ वो सब कुछ कह देती हैं जो कभी कभी एक किताब भी नहीं कह पाती है.... ये वोही पंक्तियाँ हैं

    शुक्रिया :)

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  3. वाह ... बेहतरीन

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  4. उम्दा ग़ज़ल...

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