Friday, August 8, 2014

बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा............ओम प्रभाकर



तू अभी से सो रही है, सुन जरा
रातरानी महकती है सुन जरा।

सुन जरा मेरे लबों की तिश्नगी
तिश्नगी भी चीखती है सुन जरा।


कुछ दिनों से क्यूं हमारे दरमियां
बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा।


हदे-शोरो-गुल ये मेरी खामुशी
बेनवा कुछ कह रही है सुन जरा।


हां, अभी भी गोशा-ए-दिल में कहीं
एक नागिन रेंगती है, सुन जरा।


--ओम प्रभाकर 


7 comments:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 10/08/2014 को "घरौंदों का पता" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1701 पर.

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  2. कुछ दिनों से क्यूं हमारे दरमियां
    बांसुरी-सी बज रही है सुन जरा।
    हदे-शोरो-गुल ये मेरी खामुशी
    बेनवा कुछ कह रही है सुन जरा।
    ... बहुत खूब!

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  3. बहुत बढ़िया

    सादर

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  4. बढ़िया प्रस्तुति।
    रक्षाबन्धन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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