Wednesday, August 6, 2014

सुरमई शाम में..........जै बांवरा

 













कल हारे, संमुदर किनारे,
सुरमई शाम में,
झंझोड़ उलझे आस्तित्व को,
बिखरा दीं मैनें अपनी जुल्फें,
बिछा दिये आतुर नैन,
मांगी, तेरे लिये इक दुआ,
फिर देर तक सन्नाटे में,
कुछ भी न था,
कहने को, करने को, सोचने को,
भीगी रेत पर, झुंझला के, ऐसे में,
जैसे लिखा था तूनें......
मैनें अपना नाम लिखा.......


-जै बांवरा

 
http://kehnedoaajmujhe.blogspot.in/2007/11/blog-post_6029.html

9 comments:

  1. मन को छूती बहुत सुन्दर प्रस्तुति ! बहुत खूब !

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  3. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 07/08/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    ReplyDelete
  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-08-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1698 में दिया गया है
    आभार

    ReplyDelete
  5. बेहतरीन प्रस्तुति...

    ReplyDelete
  6. बेहतरीन ...रचना,,,,सुंदर

    ReplyDelete