Thursday, July 31, 2014

आज गाँव हमें याद आया है........सचिन अग्रवाल








अब मैं भी बेगुनाह हूँ रिश्तों के सामने
मैंने भी झूठ कह दिया झूठों के सामने

एक पट्टी बाँध रक्खी है मुंसिफ ने आँख पर
चिल्लाते हुए गूंगे हैं बहरों के सामने

मुझको मेरे उसूलों का कुछ तो बनाके दो
खाली ही हाथ जाऊं क्या बच्चों के सामने

एक वक़्त तक तो भूख को बर्दाश्त भी किया
फिर यूँ हुआ वो बिछ गयी भूखों के सामने

वो रौब और वो हुक्म गए बेटियों के साथ
खामोश बैठे रहते हैं बेटों के सामने

मुद्दत में आज गाँव हमें याद आया है
थाली लगा के बैठे हैं चूल्हों के सामने






 सचिन अग्रवाल
फेसबुक से

11 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर और ह्रदय स्पर्शी रचना

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (01.08.2014) को "हिन्दी मेरी पहचान " (चर्चा अंक-1692)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. bahat gehra aur sundar rachna, Sachin ji

    Gajendra Mohan Dev Sarma

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  4. bahat gehra aur sundar rachna, Sachin ji

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  5. बहुत उम्दा अभिव्यक्ति।
    नई रचना : सूनी वादियाँ

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  6. वाह बहुत बेहतरीन

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  7. वाह... बहुत सुन्दर

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  8. मुझको मेरे उसूलों का कुछ तो बनाके दो
    खाली ही हाथ जाऊं क्या बच्चों के सामने

    एक वक़्त तक तो भूख को बर्दाश्त भी किया
    फिर यूँ हुआ वो बिछ गयी भूखों के सामने


    आहाहा सीधे यहाँ .... यहाँ,,, दिल में ....

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  9. अब हमें भी गाम्व याद आने लगे हैं

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  10. लाजवाब ग़ज़ल...गज़ब तेवर...

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