Tuesday, September 3, 2013

चलाए तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके..........डॉ. लोक सेतिया 'तन्हा'


उड़ाने ख्वाब में भरते, कटे जब से हैं पर उनके
अभी तक हौसला बाकी, नहीं झुकते हैं सर उनके।

यही बस गुफ्तगू करनी, अमीरों से गरीबों ने
उन्हें भी रौशनी मिलती, अंधेरों में घर उनके।

उन्हें सूली पे चढ़ने का तो कोई गम नहीं था पर
यही अफसोस था दिल में, अभी बाकी समर उनके।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को
रहे सबको पिलाते पर, रहे सूखे अधर उनके।

हुई जब शाम रुक जाते, सुबह होते ही चल देते,
जरा कुछ देर बस ठहरे, नहीं रुकते सफर उनके।

दिए कुछ आंकड़े सरकार ने क्या-क्या किया हमने
बढ़ी गिनती गरीबों की, मिटा डाले सिफर उनके।

हमारे जख्म सारे वक्त ने ऐसे भरे 'तन्हा'
चलाए तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके।

-डॉ. लोक सेतिया 'तन्हा'

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