Wednesday, September 18, 2013

उल्लास और हर्ष-भरे सत्र, अब कहाँ.........दानिश भारती




उल्लास और हर्ष-भरे  सत्र, अब कहाँ
होते हैं लोग झूम के एकत्र  अब कहाँ

सन्देश आते-जाते हैं अब तो हवाओं में
काग़ज़, क़लम, दवात कहाँ, पत्र अब कहाँ

मैं जिन पलों में सोचूँ तुम्हें, हैं वो दिव्य पल
आनन्द खोज पाऊँ मैं अन्यत्र अब कहाँ

क्यूँ मान्य होते जाते हैं फूहड़ लिबास ही
गरिमा थे जो बदन की, गए वस्त्र अब कहाँ

मन्नत भी पूरी होती है, वन्दन करो सही
यूँ मत कहो, कि आस के नक्षत्र अब कहाँ

'बापू' ने जो सिखाये  'अहिंसा' के गुर हमें
सद्भाव, आत्म-बल से भरे शस्त्र अब कहाँ

जो पढ़ सको, तो पढ़ लो इन्हीं शब्दों में मुझे
कह दूँ मैं मन के भाव यूँ, सर्वत्र अब कहाँ

थी काव्य-साधना की जो "दानिश" परम्परा
गुरु-शिष्य अब कहाँ, वो भला छत्र अब कहाँ

- दानिश भारती


सत्र=सम्मलेन, बैठकें, अन्यत्र=कहीं ओर, दूसरी जगह, नक्षत्र=ग्रह-सितारे, सर्वत्र=हर जगह, छत्र=आश्रय, शरण-स्थल, पाठशाला

6 comments:

  1. सुंदर रचना...
    आप की ये रचना आने वाले शुकरवार यानी 20 सितंबर 2013 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है... ताकि आप की ये रचना अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित है... आप इस हलचल में शामिल अन्य रचनाओं पर भी अपनी दृष्टि डालें...इस संदर्भ में आप के सुझावों का स्वागत है...
    उजाले उनकी यादों के पर आना... इस ब्लौग पर आप हर रोज 2 रचनाएं पढेंगे... आप भी इस ब्लौग का अनुसरण करना।



    आप सब की कविताएं कविता मंच पर आमंत्रित है।
    हम आज भूल रहे हैं अपनी संस्कृति सभ्यता व अपना गौरवमयी इतिहास आप ही लिखिये हमारा अतीत के माध्यम से। ध्यान रहे रचना में किसी धर्म पर कटाक्ष नही होना चाहिये।
    इस के लिये आप को मात्रkuldeepsingpinku@gmail.com पर मिल भेजकर निमंत्रण लिंक प्राप्त करना है।



    मन का मंथन [मेरे विचारों का दर्पण]

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  2. आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल {बृहस्पतिवार} 19/09/2013 को "हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल {चर्चामंच}" पर.
    आप भी पधारें, सादर ....राजीव कुमार झा

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  3. मैं जिन पलों में सोचूँ तुम्हें, हैं वो दिव्य पल
    आनन्द खोज पाऊँ मैं अन्यत्र अब कहाँ
    बहुत सुंदर उद्गार ...!!

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