Monday, September 16, 2013

मिरे खुलूस का अंदाज़ ये भी सच्चा है..........फ़ातिमा हसन


मैं टूटकर उसे चाहूँ यह इख्तियार भी हो
समेट लेगा मुझे इसका एतबार भी हो

नई रुतों में वो कुछ और भी करीब आए
गई रुतें का सुलगता-सा इंतज़ार भी हो

मैं उसके साथ को हर लम्हा मोतबर जानूँ
वो हमसफर है तो मुझसा ही बेदयार भी हो

मिरे खुलूस का अंदाज़ ये भी सच्चा है
रखूं न रब्त मगर दोस्ती शुमार न हो

सफ़र पे निकलूं तो रस्में-सफ़र बदल जाए
किनारा बढ़ के कभी खुद हमकिनार भी हो.

-फ़ातिमा हसन 

इख्तियारः अधिकार, एतबारः भरोसा, लम्हाः क्षण, मोतबरः विश्वस्त
बेदयारः बेघर, खुलूसः निश्छलता, रब्तः संबंध, हमकिनारः आलिंगित   

सैयदा अनीस फातिमा....( फ़ातिमा हसन )
जन्मः 25, दिसम्बर, 1953, करांची, पाकिस्तान  

 


5 comments:

  1. नमस्कार आपकी यह रचना कल मंगलवार (17-09-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  3. लिंक ५.- चाहत और मोहब्बत का बहुत ही सुन्दर संयोजन किये है फातिमा हसन ने ,एक सुन्दर ग़ज़ल को शेयर करने के लिए आपका आभार।

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