Sunday, July 1, 2018

दर्द इतना कहाँ से उठता है....नादिर खान

दर्द इतना कहाँ से उठता है।
ये समझ लो की जाँ से उठता है।

सबसे आँखें चुरा रहा था मै
गम मगर अब जुबां से उठता है।

वो असर एक दिन दिखायेगा
शब्द जो भी जुबां से उठता है।

दिल गुनाहों से भर गया सबका
अब भरोसा जहाँ से उठता है।

आग लालच की खा गयी सबको
अब धुआँ हर मकाँ से उठता है।

याद किरदार फिर वही आया 
जो मेरी दास्तां से उठता है।

फिर कोई वस्वसा नहीं होता
न्याय जब नकदखाँ से उठता है।

मसअले प्यार से हुये थे हल
वो हुनर अब जहाँ से उठता है।


आग दिल की तो बुझ गई नादिर
बस धुआँ ही यहाँ से उठता है।
-नादिर खान


7 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. बहुत बढ़िया गजल🙏

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  3. वाह बहुत सुन्दर बेहतरीन गजल।

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (02-07-2018) को "अतिथि देवो भवः" (चर्चा अंक-3018) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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  5. Wah!!! Bahut, bahut accha laga!

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