Sunday, March 20, 2016

गिन लेना हमको अपने दिलदारों में............महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’


वक़्त बिताया अब तक तो हमने रंगीं गुलज़ारों में
आज कहो तो जी लेंगे हम इन अंधे गलियारों में

कोई ख़ता तो होगी जो तुम नाराज़ी में बैठे हो
उफ़ न कभी लब से निकलेगी, चिनवा दें दीवारों में

जो न कभी तुमने चाहा वो दिल में ना लाए हरगिज़
लोग हमारी गिनती करते हैं दिल के लाचारों में

जान लिया नामुमकिन है दिल को पाना अहसासों से
पास न दौलत तो मत जाना उल्फ़त के बाज़ारों में

आज तलक मुँह ना मोड़ा है ख़लिश वफ़ा से तो हमने 
भूल न जाना, गिन लेना हमको अपने दिलदारों में.

बहर --- २११२  २२२२  २२२२  २२२२
 महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (22-03-2016) को "शिकवे-गिले मिटायें होली में" (चर्चा अंक - 2289) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    रंगों के महापर्व होली की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुंदर रचना...रंगोत्सव की शुभकामनयें...

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