Thursday, March 17, 2016

इक उम्र बीती आए तब मिलने के वास्ते......महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’




इक उम्र बीती आए तब मिलने के वास्ते
ज्यों आए दिल का चैन वो हरने के वास्ते

हो के नहीं रिश्ता हुआ दोनों के दरमियाँ
हम हुस्न, वो थे इश्क़, बस कहने के वास्ते

नज़रें मिलीं तो थीं मगर वो ही न मिल सके
मानिंदे-शम्मा हम रहे जलने के वास्ते

बेकार सब जीना रहा, हासिल न कुछ हुआ
हम कुछ नहीं क़ाबिल रहे करने के वास्ते

है अब नहीं उम्मीद या अरमान कुछ ख़लिश
हम जी रहे हैं सिर्फ़ अब मरने के वास्ते.

बहर --- २२१२  २२१२  २२१२  १२

महेश चन्द्र गुप्त ख़लिश

गूगल ग्रुप एक मंच में प्रकाशित रचना

For subscribe ekmanch go to
  

3 comments:

  1. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 18/03/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 245 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (18-03-2016) को "दुनिया चमक-दमक की" (चर्चाअंक - 2285) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ

    ReplyDelete