Thursday, May 16, 2019

रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता ....महादेवी वर्मा

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रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;
इस निदाघ के मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता !

उसमें मर्म छिपा जीवन का,
एक तार अगणित कंपन का,
एक सूत्र सबके बंधन का,
संसृति के सूने पृष्ठों में करुणकाव्य वह लिख जाता !

वह उर में आता बन पाहुन,
कहता मन से, अब न कृपण बन,
मानस की निधियाँ लेता गिन,
दृग-द्वारों को खोल विश्वभिक्षुक पर, हँस बरसा आता !

यह जग है विस्मय से निर्मित,
मूक पथिक आते जाते नित,
नहीं प्राण प्राणों से परिचित,
यह उनका संकेत नहीं जिसके बिन विनिमय हो पाता !

मृगमरीचिका के चिर पथ पर,
सुख आता प्यासों के पग धर,
रुद्ध हृदय के पट लेता कर,
गर्वित कहता ‘मैं मधु हूँ मुझसे क्या पतझर का नाता’ !

दुख के पद छू बहते झर झर,
कण कण से आँसू के निर्झर,
हो उठता जीवन मृदु उर्वर,
लघु मानस में वह असीम जग को आमंत्रित कर लाता !
-महादेवी वर्मा 


7 comments:

  1. अत्यन्त सुन्दर ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (17-05-2019) को "बदलाव की सुखद बयार" (चर्चा अंक- 3338) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत खूब .... ,सादर नमस्कार दी

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  4. वाह ! तहे दिल से आभार दी, सुन्दर प्रस्तुति के लिए, सुन कर मन मुग्ध हो गया
    सादर

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  5. बेहतरीन रचना

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